Wednesday, 30 March 2016

जो करो सोचकर करो



जो करो सोचकर करो



एक बार एक विषैला सांप नदी के किनारे लेटा धूप का आनंद ले रहा था कि तभी न जाने कहां से एक काला कौआ उसके ऊपर झपटा और उसे अपने पंजों में दबाकर आकाश में उड़ गया । सांप बुरी तरह ऐंठ कर खुद को कौए के पंजों से छुड़ाने का प्रयत्न करने लगा , मगर लाख प्रयास करने पर भी सफल नहीं हुआ । यह देखकर सांप ने गुस्से से फुंफकारते हुए कौए के शरीर में अपने जहरीले दांत गाड़ दिए । कुछ ही क्षणों में जहर का प्रभाव दिखने लगा । काला कौआ दर्द से फड़फड़ाता हुआ आकाश से धरती पर आ गिरा । सांप मरते हुए कौए के पंजों से निकल कर भग गया । कौआ अब मौत के दरवाजे पर खड़ा था सांप का जहर उसके शरीर में हर ओर फैल चुका था । मरने से कुछ क्षण पहले उसने सोचा -'आह ! क्या मुझे पहले नहीं सोचना चाहिए था ? यह मेरी भूल थी कि मैंने बिना सोचे -विचारे एक जहरीले सांप को उठा लिया । वही सांप आखिर मेरी मौत का कारण बना । ' निष्कर्ष : समझदार सोचकर करते हैं ,मूर्ख करके सोचते हैं ।





बीती घटनाओं से सबक


बीती घटनाओं से सबक



एक बार एक भेड़िया किसी जंगली कुत्ते से युध्द करते समय बुरी तरह घायल हो गया । वह इतना घायल था कि उसके लिए चलना -फिरना भी दूभर था । वह एक झरने से कुच दूरी पर लेटा दर्द से कराह रहा था । जब वह लेटा कराह - कराहकर अपने जख्मों को चाट रहा था और उन पर मंडराती मक्खियों को भगा रहा था , तभी एक मेमना उधर से गुजरा । भेड़िया की दिनों से भूखा था , उसका शरीर सूख -सा रहा था । उसके मस्तिष्क में तभी एक विचार कौंधा वह मेमने से बोला - " मेरे प्यारे दोस्त ,क्या तुम मेरे लिए थोड़ा पानी भूखा प्यासा हूं । जब मुझे पानी मिल जाएगा तो भोजन का प्रबंध मैं खुद ही कर लूंगा । " " आप तीक कहते हैं श्रीमान ! " मेमना बोला - " अगर मैं आपके लिए थोड़े पानी का प्रबंध कर दूंगा तो आप मेरा भोजन बना कर खा जाएंगे । मुझे अपने भाई का वह परिणाम म्म्लूम है, जब आपके एक भाई ने उसे यह कहकर खा लिया कि वह पहाड़ी नदी में नीचे खड़ा उस भेड़िए का पानी गंदा कर रहा था । जबकि सच्चाई यह थी कि भेड़िया ऊपर पानी पी रहा था और बेचारा मेमना नीचे था । मुझे खेद है कि मैं आपके लिए पानी नहीं ला सकता । अपने दुर्भाग्य का मुकाबला आप खुद करें । इस बार बारी आपकी है। " यह कहकर मेमना एक ओर चल दिया ।

निष्कर्ष : दूसरों के साथ बीती घटनाओं से सबक लेना चाहिए ।







बुरी संगति का दण्ड


बुरी संगति का दण्ड


एक बार एक किसान  ने पक्षियों को पकड़ने  के लिऐ  अपने खेत  में  जाल  बिछाया । जाल में बहुत से पक्षी फंसे । फंसे हुए पक्षियों में जंगली कौए तो थे  ही , बेचारा एक कबूतर भी फंसा पड़ा था ।
   वह बेचारा लगा किसान की मिन्न्तें करने -" ओह, मालिक आपने इन कौओं के साथ मुझे क्यों पकड़ लिया ? कृपया मुझे छोड़ ही दीजिए । आप तो जांते हैं, मैं एक हानिरहित सीधा -सादा पक्षी हूं कि आप अपने सच्चे मित्र को हानि नहीं पहुंचाना चाहेंगे । "
     " मैं अच्छी तरह समझता  हूं । " किसान बोला - " मैं जानता हूं कि तुम किसानों को नुकसान नहीं पहुंचाते । तुम उनके मित्र हो,मगर तुम्हें भी उसका दण्ड भुगतना पड़ेगा  । "
    अब  कबूतर  को  अपनी  गलती का एहसास  हुआ , मगर तब तक बहुत देर हो चुकी  थी ।
निष्कर्ष : बुरी संगत से बचो , इसका फल भी बुरा होता है ।








Thursday, 17 March 2016

Traveller and snake


यात्री और सांप 




   एक यात्री किसी गांव की सड़्क पर जा रहा था । कड़ाके की ठंड पड़ रही थी । अचानक यात्री ने रास्ते में झड़ियों के नीचे एक संप सर्दी से ठिठुरा हुआ देखा । उसका पूरा शरीर ठंड से ऐंठ - सा गया था और वह करीब - करीब मरणासन्न हो रहा था ।
      यात्री दयावान था । उसने सांप को उठाकर अपनी कमीज की जेब में रख लिया, ताकि उसके शरीर की गरमी से सांप का शरीर गरम हो जए और उसे नया जीवन मिले ।
    कुच देर तक तो सांप कमीज की जेब में बिना हिले -डुले  पड़ा रहा। पांरतु धीरे - धीरेउस यात्री के शरीर की गरमी पाकर वह सजीव और चंचल हो उठा और शीघ्र ही असली रुप में आ गया ।     सांप धीरे - धीरे कमीज की जेब से होकर यात्री के शरीर पर ऊपर की ओर सरकने लगाऔर इससे पहले कि बेचारा यत्री कुछ समझ पाता सांप ने यात्री के सीने में अपने जहरीले दांत गाड़ दिए ।
    यात्री चिल्ला उठा - " आह! निर्दयी सांप , क्या यही मेरी दया का पुरी दया का पुरस्कार है? क्या मैं इसी योग्या था ? तुम भी उन्हीं कृतघ्न प्राणियों में से हो, जिनसे यह पुरासंसार भरा हुआ है और मैं उन सीधे - सादे लोगों में हूं , जिन्हें इस प्रकार के भलाई के कामों के लिए इस  प्रकार जान से हाथ धोना पड़्ता है । "


   निष्कर्ष :  निर्दयी से दया की आशा न करें।  






Bat and Hunter Man





चमगादड़ और शिकारी




 एक बार एक शिकारी ने एक चमगादड़ को पकड़ लिया । वह " कृपया मेरी जान बख्श दो ! मेरे छोटे -छोटे बच्चे   घर पर मेरी प्रतीक्षा कर रहे होगें । मुझ पर दया करो । "
    "बिलकुल नहीं। " शिकारी बोला -" मैं पक्षियों पर दया नहीं करता । "
   " परंतु मैं पक्षी नहीं हूं । "  चमगादड़ ने कहा - " मेरा शरीर देखो । मैं देखने में चूहा लगता   हूं । ",
   " हूं ! " शिकारीने चमगादड़ को ध्यान से देखा और उसे छोड़ दिया । 
    दुर्भग्यवश कुच दिनों बाद उसी चमगादड़ को किसी दूसरे शिकारी ने पकड़ लिया । 
  " कृपया मुझे जान से मत मारिए ! " चमगादड़ घिघियाया--
  " मेरे ऊपर दया दृष्टि कीजिए । " 
  " बिलकुल नहीं ! " शिकारी ने जवाब दिया--" मैं चूहों पर दया नहीं करता । "
 " पर क्षीमान मैं चूहा नहीं हूं । " चमगादड़ बोला --" आप मेरे पंखदेखिए । क्या चूहों के पंख होते हैं ? "
   शिकारी ने उसकी बात सुनकर उसे छोड़ दिया ।  इस प्रकार  उस चमगादड़ को दूसरीबार जीवंदान मिला ।
   
   निष्कर्ष : चालाक लोग  अपनी सुविधानुसार अपनादल बदल लेते हैं ।
   
 





Thomas Edison





महान वैज्ञानिक थॉमस एडिसन बेहद मेहनती एवं जुझारु प्रवृति के व्यक्ति थे । बचपन में उन्हें यह कहकर स्कूल से निकाल दिया गया कि वे मंद बुध्दि बालक हैं । उसी थॉमस एडिसन ने कई महत्वपूर्ण आविष्कार किए , जिसमें से बिजली का बल्ब प्रमुख है । उन्होंने बल्ब का आविष्कार करने के लिए हजारों बार प्रयोग किए थे तब जाकर उन्हें सफलता मिली थी ।
एक बार जब वे बल्ब बनाने के लिए प्रयोग कर रहे थे तभी एक व्यक्ति ने उनसे पूछा ,'आपने करीब एक हजार प्रयोग किए लेकिन आपने सारे प्रयोग असफल रहे और आपकी मेहनत बेकार हो गई, क्या आपको दुख नहीं होता?
एडिसन ने कहा, ' मैं नहीं समझता कि मेरे एक हजार प्रयोग असफल हुए हैं। मेरी मेहनत बेकार नहीं गई क्योंकि मैंने एक हजार प्रयोग करके यह पता लगाया है कि इन एक हजार तरीकों से बल्ब नहीं बनाया जा सकता । मेरा हर प्रयोग ,बल्ब बनाने कि प्रक्रिया हिस्सा  है और मैं अपने प्रत्येक प्रयास के साथ एक कदम आगै बढता हूं । कोई भी सामान्य  व्यक्ति होता तो वह जल्द ही हार मान लेता लेकिन थॉमस एडिसन ने अपने प्रयास जारी रखे और हार नहीं मानी । आखिरकार एडिसन कि मेहनत रंग लाई और उन्होंने बल्ल का आविष्कार करके पूरी दुनिया को रोशन कर दिया । यह थॉमस एडिसन का विश्वास ही था जिसने आशा की किरण को बुझने नहीं दिया ।

Thomas Edison